Thursday, December 4, 2008

हर घर

हर घर

हर घर चुपचाप से ये कहता है,
कि इसमे कौन रहता है,

घर के झगडे में सास हारते हारते क्यों जीत जाती है,
बूढे बाप के लिए रोटियाँ गिन के क्यों नही बनती,
यहाँ के दरवाजे क्यों बंद हो जाते हैं शाम से,

हर घर चुपचाप से ये कहता है
कि इसमे कौन रहता है,

क्यों बच्चों को खेलने से मना करते है दादा दादी के साथ,
क्यों लगा रहता है कर्फ्यू सा,
यहाँ आते ही थम जाता है सन्नाटा क्यों,
क्यों धुंध समय की छंटती नही यहाँ

हर घर चुपचाप से ये कहता है
कि इसमे कौन रहता है,

फैले रहते हैं घर में कपड़ों के अम्बार
उड़ते हैं रद्दी कागज़ और अखबार
जूठे प्याले झांकते हैं सोफे के पीछे से
टूटे खिलौने चारपाई के नीचे से
कोने परदों के छोड़ चुके हैं रंग अपना
दीवालों पर सूखा दाग बहता है

हर घर चुपचाप से ये कहता है
कि इसमे कौन रहता है,

No comments: