Thursday, December 4, 2008

हर घर

हर घर

हर घर चुपचाप से ये कहता है,
कि इसमे कौन रहता है,

घर के झगडे में सास हारते हारते क्यों जीत जाती है,
बूढे बाप के लिए रोटियाँ गिन के क्यों नही बनती,
यहाँ के दरवाजे क्यों बंद हो जाते हैं शाम से,

हर घर चुपचाप से ये कहता है
कि इसमे कौन रहता है,

क्यों बच्चों को खेलने से मना करते है दादा दादी के साथ,
क्यों लगा रहता है कर्फ्यू सा,
यहाँ आते ही थम जाता है सन्नाटा क्यों,
क्यों धुंध समय की छंटती नही यहाँ

हर घर चुपचाप से ये कहता है
कि इसमे कौन रहता है,

फैले रहते हैं घर में कपड़ों के अम्बार
उड़ते हैं रद्दी कागज़ और अखबार
जूठे प्याले झांकते हैं सोफे के पीछे से
टूटे खिलौने चारपाई के नीचे से
कोने परदों के छोड़ चुके हैं रंग अपना
दीवालों पर सूखा दाग बहता है

हर घर चुपचाप से ये कहता है
कि इसमे कौन रहता है,

Tuesday, December 2, 2008

एक पत्र पड़ोसी के नाम

प्रिय पड़ोसी

वैसे तो तुम मेरे पड़ोसी हो पर हो छोटे भाई जैसे . तुम्हारी शादी और फ़िर बगल के मकान में shift करने से पहले तक हम दोनों इकट्ठे रहे थे. आज ये पत्र लिखना जरूरी हो गया है. मेरे घर वाले तो कह रहें है की लट्ठ ले कर पिल पड़ा जाए पर तुम तो जानते हो की मैं लोकतंत्र में बहुत श्रध्हा रखता हूँ.... शान्ति और अहिंसा मेरे रग रग में है ....... मेरे घर के कमरे और गलियारे तक 'गाँधी' 'अशोक' के नाम पर हैं.
वैसे तो मुझे तुम्हारे घर वालों के चालचलन पर कुछ नही कहना चाहिए पर तुम्हारे जीजा और उनके लम्पट दोस्तों ने पिछले दिनों जिस तरह मेरे घर की छत पर पत्थर फेंके और दिवाली न होते हुए भी बम और पटाखे फोडे उससे मेरे घर के लोगों के सर फूट गये ....कमरे में रखी चादर जल गई ....और पिता जी के फोटो का शीशा चिटक गया ... उसके बाद यहाँ काफी गुस्सा है. ...हमेशा राम राम करने वाले बड़े बब्बा और लेफ्टिस्ट छोटे दद्दा तक इस बार बहुत नाराज हैं. तुम्हारे जीजा के दोस्त यूँ तो गर्मियों में अक्सर हमारी छत पर सो जाते हैं पर मैंने कभी तुमसे कुछ कहा? मेरे दोस्त !कुछ मेरी भी इज्जत का ख्याल रखो ......चाहे अपने जीजा को न भेजो पर उसके वो काले चश्मे वाले और एक दाढ़ी वाले दोस्त को जरूर भेजो जिससे सारी ग़लत फहमी दूर हो जाए. मै जानता हूँ की वो भटके हुए नौजवान है और उनसे नरमी से पेश आना चाहिए. वैसे भी तुम तो जानते ही हो कि मैंने आज तक एक मक्खी भी नही मारी . इन दोनों को भी बड़े प्यार से समझाऊंगा. तुम अगर चाहो तो ऊपर वाला कमरा भी इनको हर गर्मियों में दे दूँगा..... पर इस बार मेरी सुन लो..... उन्हें कोई कुछ नही कहेगा .पिछली बार मोहल्ले के जिस लड़के को पकड़ा था (छत से आँगन में कूदते हुए) पंचायत के फैसले के बाद भी आज तक उसे अपने घर में रख कर मुफ्त की रोटियां खिला रहें हैं...... आखिर इनको सुधारना जरूरी है. इससे कोई फर्क नही पड़ता की ये हमारी थाली में खा कर भी मेरे ही पर्स से चोरी करता हैं.
बस एक बार मेरी इज्जत की खातिर उन दोनों को भेज दो....एक बार यहाँ आ जायें तो देखना, मेरे अपने बच्चों से भी ज्यादा प्यार करूंगा...... उन्हें पंचायत के सामने भी नही भेजूंगा...मैं जानता हूँ कि हमें शान्ति और सौहार्द्र का वातावरण बनाना है ......और अपनी संस्कृति , सभ्यता कि रक्षा करनी है.....न कि उनसे या तुमसे बदला लेना है ... बदले कि भावना से तो मैं मच्छर भी नही मारता ....ये तो तुम्हारी जीजा के दोस्त हैं........इस बार यहाँ सब चाहतें हैं कि कुछ होना चाहिए.......तो अब तू ही कुछ कर ....बस एक बार


तुम्हारा पड़ोसी
म सिंह भारतवाला